बस्तर पठार में सिंचाई के साधन

 

Dr. Pritibala Chandrakar

Assistant Professor, Govt. Armari College, Armari, Dist. Balod CG

*Corresponding Author E-mail: priti.chandrakar1@gmail.com

 

ABSTRACT

विष्वसनीय फसल उत्पादन के लिए उन सभ्ज्ञी भागों में जहा वर्षा की कमी और अनियमित वितरण के कारण फसल उत्पादन प्रभावित होता है, पानी एक महत्वपूर्ण अवयव है । फसल उत्पादन के लिए पानी की पर्याप्त मात्रा में आवष्यकता होती है । फसल के लिये पानी की आवष्यकता की पूर्ति के लिए नियंत्रित अंतराल में आपुर्ति की जरूरत होती है । इसलिए विष्वसनीय फसल उत्पादन के लिए उपलब्ध सिंचाई जल का दक्षता से उपयोग करना जरूरी होता है ।

 

स्थिति एवं विस्तार:-

बस्तर पठार भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिण पूर्व में स्थित है । बस्तर पठार पूर्व में उड़ीसा, पष्चिम में महाराष्ट्र, दक्षिण में आंध्रप्रदेष एवं उत्तर में रायपुर तथा दुर्ग जिले द्वारा सीमांकित है इसका विस्तार 170-46 उत्तरी अंक्षांष से 200-35 उत्तरी अक्षांष तक तथा 800-15 पूर्वी दंषान्तर से 820-15 पूर्वी दंषान्तर तक है । बस्तर पठार की लम्बाई लगभग 288 कि.मी. तथा पूर्व पष्चिम चैड़ाई 200 कि.मी. है इसका क्षेत्रफल 39144 वर्ग कि.मी. है ।

    

बस्तर पठार में कुल 3722 ग्राम 4 नगर जगदलपुर, कांकेर, किरन्दुल, और कोण्डागांव है । 56 नगर पालिका क्षेत्र जगदलपुर, कंाकेर, किरन्दुल, कोण्डागांव, बीजापुर है बस्तर पठार में सात एकीकृत  आदिवासी विकास परियोजनाए संचालित है ।

 

बस्तर पठार मे बहुत कम लगभग 37993 हेक्टेयर भूमि विभिन्न साधनों से सिंचित  है यहा संपूर्ण फसली क्षेत्र का केवल 4.30 प्रतिषत है ।

 

सिंचाई की आवष्यकता:-

बस्तर पठार में औसत वार्षिक वर्षा 1371 मि.मी. है । परन्तु वर्षा की अनिष्चितता एवं अनियमितता के कारण समय समय पर बाढ़ अथवा सूखे की स्थिति बनी रहती है । वर्षा का स्थानक वितरण भी इस प्रकार है कि आवष्कता के समय फलों के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं हो पाता । पठार की मासिक वर्षा के आर्दता सूचकांक में मौसमी परिवर्तन इस बाल का सूचक है कि यहां ऋतुगत सूखे की स्थिति है । वर्षा के मौसम में धनात्मक आर्दता एवं सुखे मौसम में ऋणात्मक आर्दता की स्थिति होती है । यहाॅ वर्षा का जल फसल नष्ट होने से बचाया जा सकता है । पठार के अधिकांष भाग पर लाल दोमट मिट्टी पायी जाती है । इसकी जल धारण क्षमता अधिक है । फलतः कम सिचाई की आवष्यकता होती है । पठार के मध्यवर्ती भाग में लाल बलुवी मिट्टी पाई जाती है जिसकी जल धारण क्षमता कम है अतः ऐसी भूमि को कृषि योग्य बनाये रखने के लिए बार बार सिचाई की आवष्यकता होती है । पठार में प्रायः सभी विकास खण्डों में जलाभाव के कारण केवल वर्षा कालीन अवधी में ही कृषी हो पाती है रवी के फसलो के लिए कम स्थान पर ही सुविधा है । अतः पठार में कम रवी की फसल बहुत कम लिया जाता है ।

 

किसी अन्य उद्योग की तुलना में सिंचाई में जल की आवष्यकता अधिक होती है । वर्तमान में निकाले गये जल का लगभग 50 प्रतिषत हिस्सा सिंचाई में होता है अतः सहि समय में जल की प्राप्तिा मात्रा में उपलब्धता अनिष्चित होती है । क्यो कि वर्षिक वर्षा का 80 प्रतिषत जल बह जाता है  तथा  पठार में सिंचाई जलाषस एवं नहरों का आभाव है जिसके कारण सिंचाई के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं हो पाता है । पठार में उद्योगो की कमी एवं षिंक्षा के आभाव के कारण जनसंख्या में 80 प्रतिषत आजिविका के लिए कृषि पर निर्भर है । अतः पठार में िसंचाई में बहुत महत्व रखता है ।

 

जिले में सिंचाई का विकास:-

योजना पूर्व का काल:- विगत शताव्दी के अंत तक बस्तर पठार में सिंचाई की कोई योजना नहीं थी सन 1896 और 1899 के विनाषकारी अकाल से कृषक और सरकार में चेतना आई और वर्षा के परिपूरक के रूप में कृत्रिम सिंचाई की जरूरत महसूस की गई बार बार के सूखे के कारण मध्य प्रान्त के धान उत्पादक के क्षेत्र में छोटे सिंचाई के साधन बनवो के लिए सन 1901 में भारतीय सिंचाई आयोग गठित किया गया ।

 

बस्तर पठार के सिंचाई योजना स्वतंत्रता के बाद भी 1960-61 में शुरू हुई यद्यपि, यहाॅ पर सिंचाई विभाग 1951-52 में स्थापित हो गयी थी । द्वितिय पंचवर्षीय योजना के अंत तक (1960-61) पठार में सिंचाई कार्यक्रम शुरू हुए ।

 

बस्तर पठार में योजना पूर्व सिंचाई काय्रक्र नहीं था । इस समय तक लोग परम्परागत साधन यथा- तालाब , पोखर, कुआ इत्यादि से सिंचाई करते थे । द्वितीय पंचवर्षीय योजना काल में 57 हेक्टेयर की सिंचाई की योजना बनायी गयी । विषेष योजना के तहत 1968-69 में दूध नदी पर जलाषय का निर्माण करके छोटी नहर प्रणाली का विकास किया गया जिसके कारण 1,103 हेक्टेयर भूमि सिंचित हुई । पंचम पंचवर्षीय योजना में कोटरी नदी पर परालकोट जलाषय का निर्माण हुआ, जिससे सिचाई क्षमता बढ़कर 18100 हेक्टेयर हो गई । छठी पंचवर्षीय योजना में झीयम जलाष्य का निर्माण हुआ । इस योजना में 48699 हेक्टेयर में सिंचाई क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया गया, लेकिन वास्तविक वृद्धि 22102 हेक्टेयर की ही हुई । सातवी पंचवर्षीय योजना के अंत तक 3 मध्यम जलाष्य तथा 263 लघु जलाषय निर्मित हो गयें थे । पठार में कुल 266 सतही उद्वहन जिसकी रूपांकित सिंचाई  क्षमता 66,812 हेक्टेयर है । 1989-94 तक वास्तविक सिंचाई 22,762 हेक्टेयर में हुआ है । जो कुल फसली क्षेत्र का 2.57 प्रतिषत है ।

 

बस्तर पठार में सिंचाई योजना का विकास 1968-69 विषेष योजना अवधि के समय द्रुतगति से हुआ । पठार में चतुर्थ पंचवर्षीय योजना अवधि तक आषातीत वृद्धि नहीं हुई, परंतु पंचवर्षीय योजना में सिंचित क्षंत्र में तीव्र गति से वृद्धि हुई है ।

 

इस तरह विभिन्न सरकारी योजनाओं के प्रारंभ होने से पठार में 1951-90 की अवधि में 68,110 हेक्टेयर में सिंचाई क्षमता का विकास हुआ है । यही आदिवासी बाहुल्य जनसंख्या, षिक्षा का आभाव, पहाड़ी एवं पठारी भू-भाग इत्यादि के कारण पठार में सिंचाई जलाषयों एवं नहर प्रणाली का अधिकतम विकास नहीं हो पाया है । सिंचाई व्यवस्था विकसित करने के लिए जन-सामान्य को स्वयं के सिंचाई व्यवस्था के लिए बैंकों द्वारा ऋण सुविधा  उपलब्ध करायी जा रहीं है ।

 

सिंचाई का वितरण:-

बस्तर पठार के प्राकृतिक स्वरूप के कारण पठार में सिंचित क्षेत्र के वितरण में क्षेत्रीय विभिन्नता स्पष्टया परिलक्षित होती है । पठार के उत्तरी एवं दक्षिणी मैदानी क्षेत्रों में सिंचाई का केन्द्रीकरण अधिक हुआ है । सिंचाई के विकास का लंबा इतिहास होने के बावजूद भी पठार में केवल 37,993 हेक्टेयर अर्र्थात कुल फसली क्षेत्र का 4.30 प्रतिषत हीं सिंचित है । पठार की भौतिक पृष्ठभूमि के कारण सिंचाई संरक्षण किस्म की है । पठार में सिंचाई का विकास खरीफ फसल विषेषकर धान की फसल के लिए विकसित किया गया है । बस्तर पठार में खरीफ फसल का 36,639 हेक्टेयर (कुल फसली क्षेत्र के 4.14 प्रतिषत)और रबी फसल का 1,379 हेक्टेयर (कुल फसली क्षेत्र का मात्र 0.15 प्रतिषत) क्षेत्र ंिसंचित है । बस्तर पठार के 13 विकासखण्डों में रबी के मौसम में कोई सिंचाई की सुविधा नहीं है । शेष विकासखंडों में भी रबी की फसल का कुल 5 प्रतिषत ही सिंचित है । पठार में भानुप्रतापपुर (7.32 प्रतिषत), चारामा (7.17 प्रतिषत, ) भोपालपटनम (6.97 प्रतिषत) विकास खण्डों में सिंचाई का अधिक विकास हुआ है । सिंचाई के उपलब्धता में स्थानीय परिवर्तन भी अधिक है । जैसे - भोपालपटनम एवं चारामा में धान की फसल क्रमषः 29.64 एवं 27.78 प्रतिषत क्षेत्र सिंचित  है । वही भैरमगढ़ तथा बास्तानार मकें क्रमषः 0.07 एवं 0.11 प्रतिषत क्षेत्र सिंचित है । पठार मेें 96.43 प्रतिषत सिंचाई केवल खरीफ फसल (धान)  के लिए होता है पठार के कई विकास खण्डों में सिंचित क्षेत्र 5 प्रतिषत से भ्ज्ञी कम है मध्य पूर्वी एवं दक्षिणी क्षेत्र के 6 विकास खण्डो में 10 से 15 प्रतिषत सिंचित क्षेत्र तथा उत्तरी भाग के दो विकासखण्डों में 15 प्रतिषत से अधिक सिंचित क्षेत्र है ।

 

अध्ययन की दृष्टि से पठाक के विकासखण्डों को चार सिंचाई प्रबलता क्षेत्र में बाटा गया है । (1) उच्च सिंचाई प्रबलता (कुल फसली क्षेत्र के 15 प्रतिषत से अधिक ), (2) सामान्य सिंचाई प्रबलता (कुल फसली क्षेत्र के 10 से 15 प्रतिषत ) (3) निम्न सिंचाई प्रबलता (कुल फसली क्षेत्र के 5 से 10 प्रतिषत) (4) अति निम्न सिंचाई प्रबलता (कुल फसली क्षेत्र के 5 प्रतिषत से कम ) 

 

1.   उच्च सिंचाई प्रबलता वाले क्षेत्र के अन्तर्गत दो विकासखण्ड है ये एक सममतल क्षेत्र है इन्द्रावती और महानदी के बिच स्थित चारामा विकासखण्ड की सहायक दूध नदी की नहर के माध्यम से सिंचाई होती है । भोपालपटनम विकासखण्ड इन्द्रावती बेसिन में स्थित है । जहा लघु सिंचाई योजनाओं से सिंचाई होती है । इन विकासखण्डों में फसली क्षेत्र का क्रमषः 24.97 एवं 23.50 प्रतिषत सिंचित है ।

 

2.   सामान्य सिंचाई प्रबलता वाले क्षेत्र के अन्तर्गत तीन विकासखण्ड आते है । इनमें नरहरपुर (सरोना) (कुल फसली क्षेत्र के 12.66 प्रतिषत सिंचित ), कांकेर (11.74) एवं कोयलीबेड़ा (11.33 प्रतिषत) विकासखण्ड सम्मिलित है ।

 

3.   निम्न सिंचाई प्रबलता वाला क्षेत्र केवल उसूर विकासखण्ड हैं । कुल फसली क्षेत्र के 7.25 प्रतिषत क्षेत्र में सिंचाई होती है ।

 

4.   अति निम्न सिंचाई प्रबलता वाले क्षेत्र के अन्तर्गत पठार के 32 विकासखण्डों में से 26 विकासखण्ड हैं जहाफ कुल फसली क्षेत्र के 5 प्रतिषत से भी कम क्षेत्र में िसचाई होती है । ये सभी क्षेत्र पठारी एवं पहाड़ है ।

 

इस प्रकार पठार में लगभग 75 प्रतिषत क्षेत्र में सिंचाई उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न स्रोतो को एक साथ जोड़ा जाना है । पठार का उबड़-खराब धरावलीय स्वरूप  एवं विभिन्न प्रकार की मिट्टी सिंचाई के विकास में प्रमुख बाधा है । पठार में सिचाई प्रगति में यह एक विरोधाभास यह है कि पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्र जो नदिया को जन्म देती है और बाध निर्माण के लिए उपयुक्त स्थल उपलब्ध कराते है । यही क्षेत्र सिंचाई की आभ से वंचित रह जाते है । क्यो की यह क्षेत्र ज्यादा कठोर चट्टान के कारण नहर एनाने एवं कुआॅ खोदने के लिए कठिनाईयुक्त है वहीं दूसरी ओर इन क्षेत्रों में कृषि योग्य भूमि का विस्तार भी कम है ।

 

सिंचाई के स्रोत:-

बस्तर पठार में सिंचाई के 4 स्रोत है - नहर, जलाषय (तलाब) नलकूप कुआ व अन्य स्रोत ।

1.   नहर:- बस्तर पठार में नहरों से सिंचाई 1968-69 में प्रारंभ हुई थी । पठार में नहरों का स्थान तीसरा है, नहर क्षरा 9,018 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती है जो कुल सिंचित क्षेत्र का 23.73 प्रतिषत और कुल फसली क्षेत्र का 1.02 प्रतिषत है । पठार के 32 विकासखण्डों में से 10 विकासखण्ड में ही नहर द्वारा सिंचाई होती है । कोयलीबेड़ा में कुल सिंचित क्षेत्र का 87.71 प्रतिषत, नरहरपुर में 87.15 प्रतिषत, एवं छिन्दगढ़ में 83.06 प्रतिषत क्षेत्र पर नहर द्वारा सिंचाई होती है । बाकी 22 विकासखण्डों में नहर द्वज्ञरा सिंचाई नहीं होती है । पठार में छूध नदी, कोटरी नदी एवं झीयम नदी पर बने  मध्यम जलाषय से ही नहर प्रणाली का विकास हुआ है अतः मानसूनी वर्षा जलाषयों की कमी एवं पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण नहर प्रणाली का विकास अधिक नहीं हुआ ।

 2. तालाब/जलाषय:- जनजाति बहुल बस्तर पठार में जलाषय ग्रामीण प्राकृतिक भू-दृष्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । पठार के अधिकांष हिस्से में स्थित भूमि प्राकृतिक जलाषय के निर्माण के लिए उपयुक्त है । जलाषय का निर्माण घाटी में, जल बहाव के आरपार अथवा ढाल की ओर मिट्टी या पत्थ्र की दीवार बनाकर किया जाता है, जिसका आकार छोटा होता है । इन जलाषयों में वर्षा काल में मानसून के समय जल एकत्रित हो जाता है। जिसका उपयोग फसल की सिंचाई के लिये होता है ।

 

पठार के इन जलाषयों के आकार, सिंचाई-क्षमता एवं संख्या में स्थानिक भिन्नता मिलती है । सममतल क्षेत्र के प्रत्येक गाॅव में कम से कम दो तालाब मिलते है । पिछले 3 दषकों में सिंचाई के जलाषय सहायता कार्यो के अन्तर्गत बनाये गये है । छोटे-छोटे तालाब सिंचाई योजना में ज्यादा कारगर सिद्ध हुए है । परन्तु अधिकांष जलाषय कम गहरें हैं जिसके कारण गर्मी के मौसम में ये जलाषय प्रायः सुख जाते है । ये जलाषय पानी के लिए पूरी तरह मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहते है, सूखा या अपर्याप्त वर्षा होने की स्थिति में सिंचाई की दृष्अि से ये जलाषय उपयुक्त नहीं है केवल बड़े जलाषयोमें, जो गिनती मं थोड़े हैं, साल भर पानी रहता है । अतः जलाषय जल निस्तर स्रोत नहीं है ।

 

पठार में 10291 हेक्टेयर में जलाषय द्वारा सिंचाई होती है । जो पठार की कुल कृषि क्षेत्र का 1.16 प्रतिषत है । पठार में लगभग 266 सिंचाई के जलाषय हैं । जिनमें 31 जलाषय की सिंचाई क्षमता 40 हेक्टेयर से भी कम है । 235 जलाषय 40 हेक्टेयर से अधिक की सिंचाई क्षमता वाले जलाषय हैं । पठार में द्वितीय योजना काल में जलाषय द्वारा केवल 500 हेक्टेयर से भी कम क्षे. में सिंचाई उपलब्ध थी । इसमें लगातार वृद्धि होते जा रहीं है । पठार की र्भागोलिक दषाओं के कारण नहर द्वारा सिंचाई सुविधा अपेक्षकृत कम है, जिससे जलाषय द्वारा सिचाई के लिये निर्भरता अधिक है । पठार में जलाषय द्वारा सिंचाई दूसरे स्थान पर है । जलाषयों द्वारा कुल सिंचित क्षेत्र का 27.08 प्रतिषत क्षेत्र सिंचित है । जलाषयों द्वारा अधिक सिंचाई भोपालपटनम, लोहण्डीगुड़ा, चारामा एवं कोंटा विकासखण्ड में कुल सिंचित क्षेत्र का क्रमषः 93.38, 82.35, 63.30 एवं 55.5 प्रतिषत क्षेत्र सिंचित है । जलाषयों द्वारा सबसे कम सिंचित क्षेत्र कोयलीबेड़ा विकासखण्ड में (0.07 प्रतिषत ) है । उसके पष्चात् नरहरपुर (0.17 प्रतिषत) अंतागढ़ (0.49 प्रतिषत) विकासखण्ड का स्थान है । जबकि 9 विकासखण्डों में जलाषयों द्वारा सिंचाई नहीं होती ।

 

कुआ:-

पठार में कुओं द्वारा सर्वाधिक क्षेत्र की सिचाई होती है । कुओं द्वारा सिंचाई का क्षेत्रफल 15231 है । यह कुल सिंचित क्षेत्र का 39.73 प्रतिषत तथा कुल कृषि क्षेत्र का 1.72 प्रतिषत है । सिंचाई के कुओं की संख्या 12470 है । पठार में विद्युत लाइनों का विस्तार अधिक नहीं है । फिर भी परम्परागत तरीके द्वारा कुओं से पाननी निकालकर सिंचाई होती है । पठार में औसत रूप से प्रति कुआ मात्र 1.21 हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र है । कुओं में वर्ष भर पानी उपलब्धन होने के कारण कुओं  से सिंचाई नहरों एवं तालाबों के मुकाबले अधिक उत्तम है । परन्तु इससे अधिक क्षेत्र की सिंचाई नहीं हो पाती है । जैसा कि प्रायः नहरों द्वारा सिंचाई में होता है । फिर भी छोटे द्वोत्रों की सिंचाई के लिए कुएॅ पर्याप्त होते है और इनका उपयोग छोटे क्षेत्र पर धान एवं बागवानी की फसल की सिंचाई के लिए होता है । कुओं द्वारा सिंचाई उन क्षेत्रों में होती हे, जहा अन्य सिंचाई के स्रोत उपलब्ध नहीं है । धान के लिए अत्यधिक जल की जरूरत को पूरा करने के लिए लाल दोमट मिट्टी कृषि क्षेत्र में भी कुओं द्वारा सिंचाई की जाती है ।

 

पठार के सभी विकासखण्डों में कुओं द्वारा सिंचाई होती है कुओं द्वारा सबसे अधिक सिंचित क्षेत्र कांकेर में 1794 हेक्टैयर है । इसके प्ष्चात् चारामा में 1782 हेक्टे. सिंचित है । लेकिन कुल सिंचित क्षेत्र का सबसे अधिक सिंचित क्षेत्र दुर्गकोंदल 98.73 प्रतिषत, नारायणपुर 85 प्रतिषत, अंतागढ़ 78.20 प्रतिषत है । कुवाकोण्डा और कटैकल्याण में कुल सिंचित क्षेत्र का 100 प्रतिषत सिंचाई कुओं क्षरा होती है । कुओं द्वारा कम सिंचाई क्षेत्र बास्तानार में 6 हेक्टेयर तथा भैरमढ़ में 10 हेक्टेयर होती है । लेकिन कुल सिंचित क्षेत्र का कुओं द्वारा कम सिंचाई उसूर  (1.87 प्रतिषत) भोपालपटनम (2.58 प्रतिषत) एवं छिन्दगढ़ (3.36 प्रतिषत) विकास खण्ड में होती है ।

 

कुआ:-

पठार में कुओं द्वारा सर्वाधिक क्षेत्र की सिचाई होती है । कुओं द्वारा सिंचाई का क्षेत्रफल 15231 है । यह कुल सिंचित क्षेत्र का 39.73 प्रतिषत तथा कुल कृषि क्षेत्र का 1.72 प्रतिषत है। सिंचाई के कुओं की संख्या 12470 है । पठार में विद्युत लाइनों का विस्तार अधिक नहीं है । फिर भी परम्परागत तरीके द्वारा कुओं से पाननी निकालकर सिंचाई होती है । पठार में औसत रूप से प्रति कुआ मात्र 1.21 हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र है । कुओं में वर्ष भर पानी उपलब्धन होने के कारण कुओं  से सिंचाई नहरों एवं तालाबों के मुकाबले अधिक उत्तम है । परन्तु इससे अधिक क्षेत्र की सिंचाई नहीं हो पाती है । जैसा कि प्रायः नहरों द्वारा सिंचाई में होता है । फिर भी छोटे द्वोत्रों की सिंचाई के लिए कुए पर्याप्त होते है और इनका उपयोग छोटे क्षेत्र पर धान एवं बागवानी की फसल की सिंचाई के लिए होता है । कुओं द्वारा सिंचाई उन क्षेत्रों में होती हे, जहा अन्य सिंचाई के स्रोत उपलब्ध नहीं है । धान के लिए अत्यधिक जल की जरूरत को पूरा करने के लिए लाल दोमट मिट्टी कृषि क्षेत्र में भी कुओं द्वारा सिंचाई की जाती है ।  

 

पठार के सभी विकासखण्डों में कुओं द्वारा सिंचाई होती है कुओं द्वारा सबसे अधिक सिंचित क्षेत्र कांकेर में 1794 हेक्टैयर है । इसके पष्चात् चारामा में 1782 हेक्टे. सिंचित है । लेकिन कुल सिंचित क्षेत्र का सबसे अधिक सिंचित क्षेत्र दुर्गकोंदल 98.73 प्रतिषत, नारायणपुर 85 प्रतिषत, अंतागढ़ 78.20 प्रतिषत है । कुवाकोण्डा और कटैकल्याण में कुल सिंचित क्षेत्र का 100 प्रतिषत सिंचाई कुओं क्षरा होती है । कुओं द्वारा कम सिंचाई क्षेत्र बास्तानार में 6 हेक्टेयर तथा भैरमढ़ में 10 हेक्टेयर होती है । लेकिन कुल सिंचित क्षेत्र का कुओं द्वारा कम सिंचाई उसूर  (1.87 प्रतिषत) भोपालपटनम (2.58 प्रतिषत) एवं छिन्दगढ़ (3.36 प्रतिषत) विकास खण्ड में होती है ।

 

नलकूप:-

पठार में नलकूप के द्वारा सिंचाई अन्य स्रोतो की अपेक्षा सबसे कम है । इसके द्वारा कुल सिंचित क्षेत्र को केवल 0.35 प्रतिषत सिंचित होता है कुल फसली क्षेत्र का 0.01 प्रतिषत नलकूप के द्वारा सिंचित होती है । सिंचाई के नलकूपों की संख्या 39 है । पठार के सिर्फ 7 विकासखण्डों में ही नलकूप के द्वारा िसचाई होती है । नलकूप के द्वारा सबसे अधिक नरहरपुर में 54 हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित है । जगदलपुर में 37 हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित है । जगदलपुर में 37 हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित है । बाकी 5 विकास खण्डों में 1 से 30 है । हेक्टेयर तक क्षेत्र नलकूपों से सिंचित होत है । लनकूप से सिंचाई की विधि अपेक्षाकृत आधुनिक एवं उत्तम है इससे भूमिगत जल का पूर्णतः उपयोग हो पायेगा । पठाार में लगभग 7.5 प्रतिषत भाग पठारी एवं पहाड़ी होने के कारण नलकूप खनन कार्य सफल नहीं हो पा रहा है ।

 

सिंचाई के अन्य स्रोत:-

बस्तर पठार में सिंचाई के अन्य स्रोतों के द्वारा 3453 हेक्टेयर भूमि में सिंचाई होती है । जो कुल कृषि क्षेत्र का 0.39 प्रतिषत और कुल सिंचित क्षेत्र का 9.08 प्रतिषत है । इस वर्ग में नाले, पोखर का घुमावदार सिंचाई के तरीके आते है । ये मौसमी साधन हैं । इसमें जल इकट्ठा  करते हैं । इस एकत्रित जल को व्यर्थ भूमि से और बहुत छोटे

 

 

नालियों से खेतों में पहुॅचाया जाता है । नाले और तालाब द्वारा सिंचाई फसलों के संरक्षण के लिए सामान्य मानसून या कम वर्षा के समय में पर्याप्त होता है । घुमावदार सिंचाई में नदी के बहाव को खेतों की ओर मोड़कर प्रभावी रूप् स ेजल का संरक्षण किया जाता है । यह निष्चित सिंचाई उपलब्ध नहीं कराती, परन्तु यह प्र्याप्त संरक्षात्मक सिंचाई उपलब्ध कराती है । पठार के 5 विकासखण्डों में अन्य स्रोतों से सिंचाई बिलकुल नहीं होती है । अन्य स्रोतों से अधिक सिंचित क्षेत्र बीजापुर विकासखण्ड मं 1 से 2 प्रतिषत तक ही है । जनजाति बहुल जनसंख्या, षिक्षा का अभाव, उड़-खाबड़ एवं वनाच्छादित धगरातल के कारण बस्तर पठार में सिंचाई का विकास अत्यंत अल्प हुआ है ।

सिंचित फसलें:-

विष्वसनीय फसल उत्पादन के लिए उन सभ्ज्ञी भागों में जहा वर्षा की कमी और अनियमित वितरण के कारण फसल उत्पादन प्रभावित होता है, पानी एक महत्वपूर्ण अवयव है । फसल उत्पादन के लिए पानी की पर्याप्त मात्रा में आवष्यकता होती है । फसल के लिये पानी की आवष्यकता की पूर्ति के लिए नियंत्रित अंतराल में आपुर्ति की जरूरत होती है । इसलिए विष्वसनीय फसल उत्पादन के लिए उपलब्ध सिंचाई जल का दक्षता से उपयोग करना जरूरी होता है । (हुकेसी और पाण्डे, 1977, 163)

 

पठार में सिंचाई योजना पूर्व के शासकों द्वारा निर्मित तालाबों एवं कुओं के द्वारा की जाती थी, लेकिन सुनियोजित ढेग से सिंचाई योजना 1965 के लगभग ष्षुरू हुई है । वर्तमान में केवल 37993 हेक्टेयर, अर्थात् कुल फसली क्षेत्र का 4.30 प्रतिषत क्षेत्र ही सिंचाई के अन्तर्गत है । पठार में केवल धान फसल के लिए सिंचाई का उपयोग ज्यादातर होता है । अन्य फसलों के अंतर्गत गन्ना, सब्जिया, दलहन फसलों का सिंचाई बहुत कम क्षेत्र में किया जाता है । कुल सिंचित क्षेत्र का 96.43 प्रतिषत क्षेत्र केवल धान का है । अन्य फसलों की सिंचाई नाम मात्र होती है । कुल सिंचित क्षेत्र में 3.96 प्रतिषत क्षेत्र अन्य फसलों का है । इसमें सब्जी, गन्ना, इत्यादि फसलें है । सब्जिया मुख्यतः घर के निकट छोटे बगीचों में उगाये जाते है ।

 

सिंचित एवं असिंचित धान फसल:-

धान पठार की मुख्य फसल है । इसके अंतर्गत 584358 हेक्टैयर क्षेत्र  है (कुल कृषि क्षेत्र का 66.04 प्रतिषत) । इसमें से 36639 हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित है । जो धान के कुल क्षेत्र का 6.26 प्रतिषत है ।

 

 

क्षेत्रिय फसल के रूप में चाॅवल की आपेक्षिक महत्ता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है, कि पठार में इसकी पैदावार अन्य सभी फसल के मुकाबले में ज्यादा है । धान ज्यादा पानी की जरूरत वाला पौधा है । इसकी विस्तृत पैदावार के लिए पानी की कमी मुख्य बाधक तत्व है । धान की फसल के लिए 100 से 150 से.मी. वर्षा की जरूरत होती है । धान के कुल क्षेत्र का केवल 6.23 प्रतिषत क्षेत्र ही सिंचाई प्राप्त करता है । इस तरह धान की फसल का बहुत बड़ा हिस्सा पूरी तरह मानसून की वर्षा पर निर्भर करता है । विकासखण्डवार धान और सिंचित धान का क्षेत्र तलिका में दर्षाया गया है ।

 

यद्यपि पठार में सिंचित क्षेत्र का 96.43 प्रतिषत धान के अन्तर्गत है । फिर भी धान की फसल के लिए सिंचाई की उपलब्धता में स्थानीक अन्तर है । चाराम विकासखण्ड में धान की फसल क्षेत्र का 31.27 प्रतिषत सिंचित है । वही सुकमा विकासखण्ड में केवल 0.68 प्रतिषत सिंचित है । वहीं सुकमा विकासखण्ड ऐसे है  जहाॅ धान का सिंचित क्षेत्र एक प्रतिषत से भी कम है । 8 विकासखण्डों में धान का सिंचित क्षेत्र 5 से 15 प्रतिषत तक है तथा 8 विकासखण्डों में 5 प्रतिषत तक है ।

 

 

 

 

 

 

 

संदर्भ ग्रंथ सूची -

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Das, M.M. 1981

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Dhillon S.S. 1990

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Fakharuddin and firoz Khan 1981

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Received on 12.05.2016       Modified on 22.05.2016

Accepted on 10.06.2016   © A&V Publications all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(2): April - June, 2016; Page 61-70